चुनावी बॉन्ड को लेकर आरोप प्रत्यारोप गरम है। एक दिन पहले ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनावी बॉन्ड को जबरन वसूली करार दिया था और पलटवार करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पूछा था कि लगभग बीस हजार करोड़ के बॉन्ड में साढ़े छह हजार करोड़ भाजपा को मिले हैं तो बाकी 14 हजार करोड़ किसे मिले हैं इसकी परत खुलेगी तो कई दल मुंह नहीं दिखा पाएंगे।
उन्होंने भाजपा के प्रभाव क्षेत्र और सांसदों की संख्या बताते हुए कहा था कि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस जैसे कई दलों को जितना मिला है वह भाजपा के मुकाबले ज्यादा है। बॉन्ड राजनीतिक दलों को मिलते हैं लेकिन अगर सांसदों की संख्या के लिहाज से इसकी समीक्षा की जाए तो आंकड़े सचमुच चौंकाते हैं। पिछले पांच सालों में चुनावी बॉन्ड के रूप में भाजपा को मिले लगभग छह हजार करोड़ रुपये को उसके 303 लोकसभा सांसदों की क्षमता के हिसाब से देंखे तो प्रति सांसद महज 20.03 करोड़ का चंदा चुनावी बॉन्ड के माध्यम से मिलने का हिसाब बैठता है। जबकि 52 सांसदों वाले कांग्रेस को प्रति सांसद के हिसाब से 27.3 करोड़ रुपये चुनावी बॉन्ड से मिले हैं।
अमित शाह भले ही चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार दिये जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बोलने से बचते दिखे, लेकिन उन्होंने इतना जरूर साफ कर दिया कि चुनावों में कालेधन के इस्तेमाल रोकने के लिए लाई गई योजना को पूरी तरह से रद्द करने के बजाय उसमें संशोधन कर बेहतर बनाने का प्रयास किया जा सकता था। भाजपा एक3-एक राज्य सीमित क्षेत्रीय दलों को कई गुना अधिक मिले चंदे को संबंधित राज्य में चुनावी मुद्दा भी बनाने की सोच रही है।